Monday, February 14, 2011

प्राचीन ग्रंथों का अनूठा संग्रह आरा का जैन सिद्धांत भवन

अपना देश हमेशा से प्राचीन धरोहरों का अनूठा केंद्र रहा है. जिसमे बिहार राज्य का स्थान भी काफी महत्वपूर्ण है, क्यूंकि यहां पर जहा नालंदा जैसा विश्व का पहला विश्वविद्यालय अवस्थित है, वहीं मिथिला और बौद्ध गया को कौन नहीं जानता. बिहार का भोजपुर जिला भी कुछ ऐसे प्राचीन वस्तुओं को अपने आप में समाहित किया है. आरा हाउस, शाहाबाद का ताजमहल- बिबिजान का हाता, नागरी प्रचारिणी सभागार, जैन ओरिएंटल लाइब्रेरी आदि. लेकिन हम बात कर रहे हैं आज जैन ओरिएंटल लाइब्रेरी की. भोजपुर जिला  मुख्यालय आरा के मुख्य बाजार स्थित जैन सिद्धांत भवन सह जैन ओरिएंटल लाइब्रेरी उत्तर भारत की लब्ध प्रतिष्ठित शोध संस्था है. यूं तो मैं बहुत बार जा चूका हूं, लेकिन हाल में आरा जाने पर यहां दोबारा गया बहुत ही शानदार अनुभूति हुई.

लाइब्रेरी का महत्व न इसके सुन्दर और प्रशांत स्थापत्य में है, न धार्मिक परिवेश में और न व्यवस्थित ग्रंथालय के रूप में ही है, अपितु यह वह सांस्कृतिक विरासत है जिसके अंतर्गत संग्रहालय और शोध संस्थान सामानांतर रूप से काम करते हैं. देश विदेश से कई विद्वान शोध के लिए यहां आ चुके हैं और निरंतर आते रहते हैं. सहस्त्रों कि संख्या में ग्रंथों का संकलन देश में कई स्थानों पर सुलभ है, परन्तु हस्तलिखित पुरातन बहुमूल्य जैन ग्रन्थ ऐसा मूल्यवान संग्रह उत्तर भारत में शायद ही दूसरे जगह हो.

शहर के मध्य में स्थित यह विशाल भवन अपनी भव्यता और शालीनता के लिए प्रसिद्ध है. संस्कृत, पाली, अंग्रेजी, गुजरती, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलगु आदि भाषाओं में यहां प्रकाशित व हस्तलिखित संग्रह है. मुद्रित ग्रन्थ जहां 25000 है, वहीं हस्तलिखित 8000 ग्रन्थ हैं.

संस्थान कि स्थापना स्व. बाबू देवकुमार जैन रईस ने जैन पुरातत्व के सरंक्षण हेतु सन 1903 में की थी. उन्होंने एक ट्रस्ट देवकुमार जैन ट्रस्ट के नाम से स्थापित किया. ट्रस्ट द्वारा भवन का संचालन होने लगा. देश के विभिन्न स्थानों से पांडुलिपियों को एकत्रित किया गया और संरक्षित किया गया. संस्थान में ताड़पत्र  पर लिखे ग्रन्थ सुरक्षित हैं, वहीं सचित्र ग्रन्थ एवं अन्य हस्तलिखित चित्रों का भी संग्रह हैं. सचित्र जैन रामायण, सचित्र भक्तामर, एवं कई बहुमूल्य चित्र संकलित किये गए हैं. गांधी जी जैसी महान विभूतियां भी इस संग्रहालय में पधार चुके हैं.

संस्थान के सचिव अजय कुमार जैन ने बताया कि शोध विभाग की ओर से बहुमूल्य एवं उपयोगी ग्रंथों के प्रकाशन के साथ श्री जैन सिद्धांत भास्कर ( the jain  antiquary ) नमक शोध पत्रिका का प्रकाशन सन 1935 से होता आ रहा है, परन्तु अर्थाभाव के कारण फ़िलहाल इसका प्रकाशन बंद है. वहीं सरकार द्वारा भी कोई सुविधा नही मिल रही है. जबकि केंद्र सरकार द्वारा भी इसे पाण्डुलिपि संसाधन केंद्र के रूप में सूचीकरण किया गया है, जो बिहार का एक मात्र केंद्र है.

संयुक्त सचिव प्रशांत कुमार जैन ने बताया कि वर्त्तमान में कुल 15 विद्यार्थी अलग-अलग स्थानों से आकर शोध कर रहे हैं, परन्तु इस संस्थान को न तो वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार द्वारा और न ही राज्य सरकार द्वारा कोई सहायता दिया जा रहा है. वहीं स्थानीय लोगों की सरकार से अपेक्षा है कि वो इसे और बेहतर बनाए. विदित हो कि यह भवन 105 वर्षों से अनवरत साहित्य एवं साहित्य महारथियों कि सेवा करता चला आ रहा है. प्राचीन भारतीय सिक्के भी यहां संग्रहीत हैं. सरकार अगर इसके प्रति उदासीन रवैया छोड़ दे तो इसकी ख्याति और बढ़ सकती है.

5 comments:

ghazalganga said...

अच्छा है. आरा में पुरातत्व पर काम करने का काफी स्कोप है. वहां के गाँव में प्राचीन टीले मिलते हैं जिन्हें गढ़ कहते हैं. उनके इतिहास को भी खंगालने की ज़रुरत है. पोस्ट करने के पहले वर्तनी पर ध्यान दें.

Dinesh pareek said...

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
http://vangaydinesh.blogspot.com/2011/03/blog-post_12.html

O.P.Pandey said...

wonderful collection Niranjan.. article aur pictur kammaal ka hai... I love such things which show the ancient history...keep writing and record these types of things...I think that it will help in the comming my projects...

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