Thursday, May 7, 2015

SalmanVerdict: Hit & Run मामला: क्या सिर्फ सलमान खान ही हैं जिम्मेदार?

वाकई में क्या फुटपाथ पर सोने वाले लोगों को मारने के लिए सिर्फ सलमान खान जैसे लोगों को ही जिम्मेदार समझा जाना चाहिए? क्या इसके लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?


दुनियाभर के दिग्गज उद्योगपतियों के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने रेड कार्पेट बिछाने की बात कही थी, लेकिन देश के उन रहवासियों का क्या, जिनके पास सिर छुपाने के लिए छत नहीं है? जिन पर सलमान खान जैसे लोग शराब के नशे में गाड़ी चढ़ा देते हैं? जिनकी बेटियां फुटपाथ पर सोते-सोते प्रेग्नेंट हो जाती हैं और बाप कौन है इसका पता तक नहीं चल पाता?

माना की नशे में फुटपाथ पर सोए लोगों की इरादतन हत्या के लिए सलमान खान जिम्मेदार हैं, उन्हें सजा मिली है और मिलनी भी चाहिए। लेकिन, क्या इसके लिए सरकारी तंत्र को भी सजा नहीं मिलनी चाहिए? अगर सरकार इन लोगों के सोने की कहीं व्यवस्था कर देती तो क्या ऐसी घटनाएं होतीं? ऐसे में सवाल ये उठता है कि सरकार कोई ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करती कि इन बेघर लोगों को घर मिल जाए? किसी धर्मशालानुमा भवन का निर्माण क्यों नहीं कराती, जहां पर फुटपाथी लोग रात गुजार सकें? अभिजीत भट्टाचार्य जैसे लोग कम से कम इन इंसानों को कुत्ता तो नहीं कहेंगे।

हालांकि, मैं फुटपाथ पर होने वाले एक्सीडेंट के पीछे उन शराबियों को तो अपराधी मानता ही हूं, लेकिन सरकार को भी इसका जिम्मेदार मानता हूं। आखिर क्यों सरकार इन लोगों के बारे में नहीं सोच रही है? हो सकता है कि ये फुटपाथी लोग वोट बैंक न हों, इस कारण से इन्हें अभिजीत के 'कुत्ते' की जिंदगी जीनी पड़ रही है। मुझे लगता है कि सरकार को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए या फिर ऐसी कोई व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे फुटपाथ पर सोने वाले लोगों को सिर छुपाने की जगह मिल सके।

PHOTO CREDIT: ASHI TIWARI

Sunday, December 21, 2014

OMG Vs PK: कहानी एक अंदाज जुदा

पीके की कहानी धरती पर खोज करने आए एक एलियन (आमिर खान) की है, जिसका रिमोट कंट्रोल खो जाता है। इसके बाद वह उसे ढूंढने के लिए दिल्ली पहुंचता है, जहां उसे भगवान की साक्षात मौजूदगी का पता चलता है। उसे यकीन होता है कि भगवान उसका रिमोट दिला देंगे। वह मंदिरों में जाता है, मन्नतें मांगता है। लेकिन सफलता नहीं मिलती है। इस दौरान संजय दत्त से लेकर अनुष्का शर्मा तक उसकी मदद करते नजर आते हैं। इसमें बड़े ही नाटकीय ढंग से उसके संघर्ष को दिखाया है। लेकिन बार-बार दिमाग में सिर्फ एक सवाल उठता है कि क्या इस फिल्म में मैं वाकई में कुछ नया देख रहा हूं? पूरी फिल्म देखने के बाद ऐसा कहीं से प्रतीत नहीं हुआ।

बार-बार ऐसा लग रहा था कि मैंने ये फिल्म देखी है। क्योंकि इस फिल्म की कहानी का मूल बिन्दु अक्षय कुमार और परेश रावल अभिनित ओएमजी (ओ माई गॉड) से मिलती-जुलती है। पीके में एलियन आमिर भगवान से भिड़ते हैं तो ओएमजी में परेश रावल। दोनों ही धर्म गुरुओं पर सवाल खड़े करते हैं और लोगों को बताते हैं कि गॉड अगर है तो उसका मकसद आम लोगों को परेशान करने की जगह मदद करना होता। लेकिन ओवरऑल फिल्म की बात करें तो मेरी नजर में आमिर अभिनीत PK से कहीं ज्यादा असरदार OMG थी।

इस फिल्म में एक एलियन की परेशानी नहीं दिखाई गई थी, बल्कि आम इंसानों की परेशानी दिखाई गई थी। हर धर्म के धर्मावलंबियों को कटघरे में खड़ा किया गया था। धर्मग्रंथों के मतानुसार कोर्ट में बहस हुई थी, न कि किसी टीवी चैनल पर। द्विअर्थी शब्दों (लुल्ल, ठोंकने) का प्रयोग भी नहीं हुआ था। फिल्म पूरी तरह से साफ-सुथरी बनी थी। लेकिन दुनियाभर के क्रिटिक्स की नजर में PK फिल्म को शानदार रेटिंग दी गई। मेरी नजर में तो PK बस एक टाइम पास मूवी है। राजू हिरानी के पास शायद कोई कहानी ही नहीं थी, जिसे वो बेहतरी से पेश कर सकें। ऐसे में OMG की मूल कहानी को ही थोड़ा बहुत फेरबदल कर बना दी PK...

#aamirkhan #PK

Sunday, June 15, 2014

एक छोटी सी ख्वाहिश...

ख्वाहिश थी उसकी आसमां का सितारा बनने की। कहती हर कोई चांद तो नहीं बन सकता न। मैं तो बस एक सितारा बनना चाहती हूं, जो लाखों-करोड़ों अरबों में भी अपनी पहचान बनाए हुए है। आसमां में नजर जाती है तो असंख्य तारे टकटकी लगाए हमें देखते हैं, मैं भी उन तारों में शामिल होना चाहती हूं। तुम्हें लगता है कि मैं कितनी छोटी सोचती हूं न, लेकिन सोचो तो जरा कि ये तारे भी तो अपनी मौजूदगी हमेशा दिखाते हैं। मानती हूं चांद को सब जानते हैं, लेकिन इन तारों की भी तो अपनी पहचान है। बस मैं भी ऐसी ही पहचान बनाना चाहती हूं। लेकिन, शायद मुनिया की किस्मत में ये छोटी सी ख्वाहिश भी नहीं लिखी थी। अपनी मां की दुलारी मुनिया।

घर जाने पर पता चला कि उसके रिश्ते की बात चल रही है। इस बात को सुनते ही वो हैरान-परेशान होकर अपनी मां को देखने लगी। उसने कहा- मां मुझे नौकरी करनी है। मुझे पढ़ना है, आगे बढ़ना, हर वो खुशियां पानी है, जिसे बचपन से चाहती आई हूं। अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। लेकिन, जब मां ने अपनी मजबूरियां गिनाई, अपने संघर्षों को बयां किया तो वो अंदर से हिल गई। मां ने सिर्फ इतना कहा कि तेरे पिता ने मुझे छोड़ दिया था, जब तू नन्ही सी थी, लेकिन उनकी कमी कभी महसूस नहीं होने दी। मैं दसवीं तक पढ़ी थी, एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी और साथ में बच्चों को ट्यूशन भी दिया, तब जाकर तूझे पढ़ा रही हूं।

मैं तो चाहती थी कि तूझे खूब पढ़ाउं, तूझे अपने पैरों पर खड़ा करूं, लेकिन मेरी तबीयत भी तो सही नहीं रहती। आज ही तेरे पिता जी का फोन आया था कि तेरे लिए उन्होंने एक लड़का देखा है। मुझे लगा कि मेरे लिए न सही, कम से कम तुम्हारे जिम्मेदारियों का तो अहसास है उन्हें। इसलिए मैंने हां कर दिया।

अपने आंसुओं को पोछती हुई मां दरवाजे के सहारे जमीं पे बैठ गई। मुनिया सब देख रही थी, लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मां को पहली बार रोते देखा था। शायद इसी कारण शादी को लेकर उसका विरोध थमता जा रहा था, लेकिन किसी तरह उसने कहा कि मां मैं नौकरी करना चाहती हूं, तुमने मुझे पढ़ाया, अब मैं तुम्हें एक अच्छी जिंदगी देना चाहती हूं। पर संघर्ष से गुजरी मां कहां सुनने वाली थी। उसने कहा कि देख मेरे खातिर तू बस हां कर दे।

मां की व्यथा को सुनने के बाद उसने हां कर दिया, सोची कि शादी के बाद भी तो मां को बेहतर जिंदगी दी जा सकती है। उसके संघर्षों को खत्म किया जा सकता है। लेकिन, ये सोचना उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। सपने संजोए मुनिया जब ससुराल पहुंची तो एक भरा पूरा परिवार मिला, वह मन ही मन काफी खुश थी। पहली बार इतना बड़ा परिवार मिला था, जिसे वो अपना कह सकती थी। लेकिन चंद दिनों में ही उसकी खुशियों पर किसी की नजर लग गई। कुछ दिन तक तो ठीक चलता रहा, लेकिन चंद दिनों बाद ही पति उससे दूर रहने लगा। ज्यादातर बाहर ही रहता और कभी घर आता तो उसके साथ रोजाना कोई दूसरी लड़की हुआ करती थी। धीरे-धीरे पता चलने लगा कि पति को सिर्फ नाम के लिए पत्नी चाहिए थी। कहा जाए तो एक नौकरानी की जरूरत थी। वो ये सब देखती रहती और कभी कुछ कहने की कोशिश की तो ससुराल के सारे लोग उस पर ही लांछन लगाने लगते।

उसने अपने पिता से जब ये बात कही, तो उल्टे पिता ने भी उसे ही चुप करा दिया। कहा कि तू भी अपनी मां की तरह है, जिसे मैंने घर से निकाल दिया था। पति जो भी करता है, वो सही है। बर्दाश्त करना सीख। इसके बाद से उसके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था। लगभग 6 माह तक नर्क रुपी ससुराल में वो कुढ़ती रही, जिंदगी को ढोती रही। 6 माह बाद मां ने उसे बुलावा भेजा। मां के पास पहुंचते ही वह फफक कर रोने लगी। उसके मुंह से सिर्फ एक ही बात निकल रही थी- मां मुझे वहां नहीं जाना। मुझे तुम्हारे साथ रहना है। तुम्हारे लिए खुशियां लानी हैं। मैं वहां नहीं जाउंगी, वरना मैं मर जाउंगी।

मां ने लाख समझाया, लेकिन उसने मां की एक बात नहीं सुनी। ससुराल के लोग भी आए संग ले जाने को, लेकिन उसने जाने से इंकार कर दिया। एक ओर संघर्षमय जिंदगी तो दूसरी ओर आस-पास के लोग भी उससे दूर रहने लगे। कई तो फब्तियां भी कसते थे। लेकिन, संघर्ष उसने जारी रखा, अपने ख्वाहिशों को पाने के लिए प्रयास करती रही। बच्चों को ट्यूशन देना शुरू कर दिया, ग्रेजुएशन कम्पलिट की। लगातार नौकरियां ढूंढती रही, पर असफलता के सिवा कुछ हाथ नहीं आ रहा था। संघर्ष ने उसके हिम्मत को तोड़ दिया था। इधर मां भी उसका साथ छोड़ कर चली गई। जिस दिन मां की मौत हुई, उसी दिन उसे नौकरी का भी ऑफर मिला।

वो रोती रही, बिलखती रही। सोचती थी कि जिसकी खुशहाल जिंदगी की खातिर मैंने संघर्ष किया, अब जब वो नहीं रही तो मेरे होने का क्या मतलब। उसने मन में निर्णय कर लिया था, अब उसे जिंदा नहीं रहना। वो ट्रेन के सामने खड़ी थी। दनदनाती ट्रेन तेजी से पास आ रही थी, तभी उसे पटरी के सामने से किसी ने खींच लिया। वह एक विकलांग बुजुर्ग व्यक्ति था, जिसे अक्सर वो पास के बाजार में भीख मांगते हुए देखती थी। शायद उसके बच्चों ने उसे घर से निकाल दिया था। वो ये सब सोच ही रही थी कि उसके कानों में एक शब्द सुनाई दिया, बेटी ! ऐसा मत करो। जिंदगी अनमोल है। हम भी तो जिंदा हैं। अपने लिए नहीं, तो दूसरों की खातिर जीना सीखो। मन में उसने सोचा, ये मैं क्या करने जा रही हूं। क्या मैं स्वार्थी नहीं हो गई हूं। मन ही मन में एक निर्णय लिया- मैं जिंदा रहूंगी, ऐसे लोगों के लिए जिंदा रहूंगी। इनके लिए जिंदगी जीउंगी। इस तरह से उसने अपनी ख्वाहिशों को ढूंढ लिया।

आगे बढ़ने के लिए मियां चापलूसी, मक्कारी जरूर करें...

जिंदगी में आगे बढ़ना है तो मियां चापलूसी, मक्कारी करना जुरूर आना चाहिए। वरना आपके जुनियर आपके सिर पे चढ़के धौंस जमाने लगेंगे। भले ही उन्हें कुछ करते न बने। मियां मैं तो कहता हूं कि जिंदगी में कुछ सिखो न सिखो, अपने आने वाली पीढ़ी को पक्का टाइप का मक्कार बनाओ और साथ में उन्हें चापलूसी की शिक्षा तो जरूर दो। ऐसा कहकर मेरे मित्र के कलेजे पे मानो ठंडक पड़ी हो। जनाब पिछले पांच सालों से एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। सुबह 10 बजे से पहुंच जाते थे ऑफीस और रात के 12 बजे तक भिड़े रहते थे। इसके पीछे उनका स्वार्थ था। स्वार्थ ये कि उन्हें कंपनी यूएसए भेज देगी, लेकिन जब लिस्ट आया तो टॉप 10 में उनका नाम नहीं था, जबकि उनके जुनियर, जिन्हें वो मक्कार समझते थे उनका नाम शामिल हो गया था।

हैरान-परेशान होकर वे अपनी बात जब अपने ऑफीस के एक वरिष्ठ को बताने लगे। अब जनाब वरिष्ठ को वो तो समझते एक बढ़िया टाइप का इंसान ही थे, लेकिन लगे हाथ उसने भी इशारा कर दिया कि गलती तो तुम्हारे में ही है। अब वे क्या करते, समझ ही नहीं पा रहे थे। फाइनली अपना सारा गुस्सा अपनी प्रेयसी पर उतार दिया। एकाध झापड़ भी लगा दिया।

ऑफीस के चक्कर में हैरान-परेशान रहने वाले मेरे मित्र को जहां रिजल्ट नहीं मिल रहा था, वहीं उनकी प्रेयसी भी उनका साथ छोड़कर चलते बनी। वे फोन पर फोन घनघनाए हुए थे, लेकिन कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। नई नौकरी के ऑफर तो बहुत थे, लेकिन वे नौकरी बदलने से डरते थे, क्योंकि जिस ओहदे पे वे ज्वाइन किए, उसी पे पिछले 5 साल से आसन जमाए हुए थे।

हर मीटिंग में तारीफ पे तारीफ सुनकर वे मोटाते जा रहे थे, इंक्रीमेंट भी मिल रहा था। लेकिन, प्रमोशन की बात सुनते ही बॉस मानो यमराज बन जाता था। कई दफा तो काम की कमियां भी गिनाने लगता। एक दफा तो मित्र ने ये तक कह दिया कि साला हमें बचपन से ही क्रांतिकारी टाइप की बातें सिखाई गईं, जबकि लाइफ के लिए सबसे ज्यादा चापलूसी जरूरी है। अब आजकल वो चापलूसी और मक्कारी की स्पेशल क्लासेस अपने जुनियर्स से ले रहा है...

Sunday, June 8, 2014

Review: Holiday- Special 26 और OMG के बाद अक्षय कुमार की एक और शानदार फिल्म

'हॉलीडे' कहानी है एक सैनिक विराट (अक्षय कुमार) की जो छुट्टियां मनाने अपने घर आता है। इस दौरान एक आतंकी घटना की गुत्थी सुलझाने में इस कदर उलझ जाता है कि उसके परिवार के साथ साथी फौजीयों की फैमिली भी संकट में आ जाती है।

फिल्म की शुरुआत आर्मी ऑफीसर विराट बक्शी (अक्षय कुमार) के एंट्री से होती है, जो अपने घर छुट्टियां मनाने आता है। स्टेशन से उसके पिता (प्रेमनाथ गुलाटी) सीधे लड़की साइबा (सोनाक्षी सिन्हा) को देखने जाते हैं. पहली बार में दोनों एक दूसरे को नापसंद करते हैं, लेकिन बाद में पसंद करने लगते हैं। इनकी लवस्टोरी शुरू हो, इसके पहले ही मुंबई में एक बम विस्फोट होता है, जिसके बाद अक्षय उसकी गुत्थी सुलझाने में लग जाते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में सब इंस्पेक्टर की भूमिका में सुमित राघवन उनके साथ हैं। कई बार अक्षय के तौर-तरीकों से वे हैरान-परेशान भी हो जाते हैं।

अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म हॉलीडे ए आर मुरगदौस की दूसरी हिंदी फिल्म है, जो थुपक्की की रिमेक है। इसे स्पेशल 26 और ओएमजी के बाद अक्षय की एक और बेहतरीन फिल्म कहा जा सकता है। हालांकि, फिल्म में कई बार ऐसा लगता है गानों को बेवजह डाला गया है, लेकिन आखिरी गाना 'अश्क न हो' इसे भी दूर कर देता है।

अभिनय- अक्षय कुमार ने शानदार एक्टिंग की है, वहीं सोनाक्षी भी बहन जी टाइप किरदार से बाहर निकली हैं। निगेटिव रोल में फरहाद का अभिनय भी ठीक-ठाक है। एक छोटे से रोल में गोविंदा भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं।

डाइरेक्शन- ए आर मुरगदौस का डाइरेक्शन काबिल-ए-तारीफ है। कहानी और स्क्रीनप्ले काफी कसा हुआ है और दर्शकों को बांधे रखता है। एक्शन, रोमांस, कॉमेडी, डायलॉग के साथ कई भावुक कर देने वाले सीन भी हैं। हर वर्ग के दर्शकों के लिए इस फिल्म में कुछ न कुछ है।

Holiday Trailer

Wednesday, September 11, 2013

कहीं आप भी शौच के बाद हाथ धोने वाले साबुन से तो नहीं नहाते!

हमारे दैनिक उपयोग में आने वाला एक महत्वपूर्ण उत्पाद है साबुन। साबुन रासायनिक और आयुर्वेदिक/हर्बल दो प्रकार के होते हैं। सामान्यत: हम टेलीविजन पर आने वाले विज्ञापनों को देख कर दैनिक उपयोग में आने वाले साबुन का चुनाव करते हैं। लेकिन, इनमें से ज्यादातर टॉयलेट सोप यानी कि शौच करने के बाद हाथ धोने वाले साबुन शामिल होते हैं। भारत में बहुत कम साबुन हैं जिन्हें बाथिंग सोप का दर्जा मिला हुआ है।

आइए, हम आपको बताते हैं आप जिस साबुन से नहाते हैं, उनमें से कौन-कौन सा साबुन है बाथिंग बार और कौन सा है टॉयलेट बार। साथ ही साबुन से जुड़ी कुछ रोचक चीजों के बारे में भी बताते हैं

साबुन बनाने की प्रक्रिया में 3 महत्त्वपूर्ण घटक वसीय अम्ल ,कास्टिक सोडा और पानी होते हैं। वसीय अम्ल (FATTY ACID ), जिसका मुख्य स्रोत नारियल, जैतून या ताड़ के पेड़ होते हैं, इसे जानवरों की चर्बी से भी निकाला जाता है। इसे टालो(TALLOW ) कहते हैं जो की बूचड़खाने से मिलता है। टालो से निकले गए वसीय अम्ल अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं। इस वसीय अम्ल(FATTY ACID ) से सोडियम लौरेल सल्फेट (SLS) का निर्माण होता है जो झाग बनाने में प्रयुक्त होता है।

यदि आप शाकाहारी हैं और आपके साबुन में जानवरों की चर्बी के बारे में पता करना है तो साबुन के रैपर पर TALLOW शब्द देख लें। टैलो लिखा है तो वह साबुन आपके लिए नहीं है। आपको फिर बिना टैलो वाले साबुन का उपयोग करना चाहिए।

साबुन के वर्गीकरण से पहले हम एक महत्त्वपूर्ण शब्द TFM के बारे में जान लें जो सामान्यत: हर साबुन के पैकेट के पीछे लिखा मिल जायेगा। "TFM " का मतलब TOTAL FATTY MATERIAL होता है जो कि साबुन का वर्गीकरण और गुणवत्ता का निर्धारण करता है। साबुन में जितना ज्यादा TFM का प्रतिशत होगा साबुन की गुणवत्ता उतनी ही अच्छी होगी। इस आधार पर हम साबुन को 3 भागों में बांट सकते हैं, जिनमें कार्बोलिक साबुन, टॉयलेट साबुन और नहाने का साबुन यानी बाथिंग बार होता है।

CARBOLIC SOAP : इस साबुन को GRADE 3 SOAP की लिस्ट में रखा जाता है। इसमें TFM का प्रतिशत 50% से 60% तक होता है और यह साबुन सबसे घटिया दर्जे का साबुन होता है। इसमें फिनायल की कुछ मात्रा होती है जिसका उपयोग सामान्यत: फर्श या जानवरों के शरीर में लगे कीड़े मारने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यूरोपीय देशों में इसे एनिमल सोप या जानवरों के नहाने का साबुन भी कहते हैं। साबुन के पीछे TFM का प्रतिशत देखकर आप खुद समझ जाएंगे कि आपका साबुन किस ग्रेड का है।

TOILET SOAP : इस साबुन को GRADE 2 SOAP की लिस्ट में रखा जाता है। गुणवत्ता के आधार पर दूसरे दर्जे का साबुन होता है। भारत में इस प्रकार के साबुन का उपयोग ज्यादातर लोग करते हैं। सामान्यतया इसका उपयोग शौच इत्यादि के बाद हाथ धोने के लिए होता है। इसमें 65% से 78% TFM होता है। कार्बोलिक साबुन की अपेक्षा इसके इस्तेमाल से त्वचा को कम नुकसान होता है। भारत में इस श्रेणी के कई उत्पाद हैं। आप खुद भी साबुन खरीदने से पहले रैपर को देख कर पढ़ सकते हैं।

BATHING SOAP: इस साबुन को GRADE 1 SOAP की लिस्ट में रखा जाता है। यह गुणवत्ता के आधार पर सर्वोत्तम साबुन है तथा इसका उपयोग स्नान के लिए किया जाता है। इस साबुन में TFM की मात्रा 76% से अधिक होती है। इस साबुन के रसायनों से त्वचा पर होने वाली हानि न्यूनतम होती है। इस लिस्ट में डव साबुन, पियर्स और निरमा के कुछ प्रोडक्ट को रखा जा सकता है।

अक्सर टीवी पर विज्ञापन देखकर हम साबुन खरीद लेते हैं। हममें से ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता है कि कौन सा साबुन बाथिंग सोप है और कौन सा साबुन टॉयलेट सोप।

साबुन में झाग के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायन सोडियम लारेल सल्फेट से त्वचा की कोशिकाएं शुष्क हो जाती हैं और कोशिकाओं के मृत होने की संभावना रहती है। यह आंखों के लए अत्यंत हानिकारक है। नहाते समय साबुन यदि आँखों में चला जाये तो इसी रसायन के असर से हमे तीव्र जलन का अनुभव होता है, त्वचा पर खुजली और दाद की संभावना होती है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि कोई भी रासायनिक साबुन त्वचा के लिए लाभदायक नहीं है। लेकिन, साबुन का उपयोग करना बंद नहीं किया जा सकता है ऐसे में हमें उसी साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें TFM की मात्रा 76% से ज्यादा हो।

Wednesday, June 19, 2013

नीतीश वर्सेस नरेंद्र मोदी: क्या ये फैसला आत्मघाती नहीं है?

पता नहीं आपको इस बात पर यकीं हो या न हो, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि बिहार की राजनीति में सिर्फ दो दिशा में ही हवाएं बहती हैं। पहली लालू के पक्ष में तो दूसरी लालू के खिलाफ में। कुल मिलाकर हाल-फिलहाल बिहार की राजनीति लालू के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। मुझे याद है कभी बिहार में लालू का शासन हुआ करता था यानी कि जनता दल का। तब वहां के लोग मुख्यत: कांग्रेसी या फिर जनता दल के सपोर्टर हुआ करते थे।

उसी दौरान केंद्र में देवगौड़ा की सरकार बनी। लालू तब भी बिहार के सीएम थे। अंतरद्वंद्व की राजनीति में जनता दल टूट गई। कई पार्टियां बनीं। नीतीश-लालू दुश्मन बने। लालू ने राष्ट्रीय जनता दल की नींव रखी तो नीतीश-शरद मिलकर जनता दल यू बनाए। बाद में समाजवादी जॉर्ज फर्नांडिस की पार्टी समता को भी जदयू में शामिल कर लिया। उधर, लालू की जातीय राजनीति के सामने बिहार में कांग्रेस अपना जनाधार खोती जा रही थी, लेकिन तब भी कांग्रेसी समर्थक कम नहीं थे।

जनाधार खो रही कांग्रेस ने उस दौरान आनन-फानन में एक और गलत कदम उठा लिया और लालू के साथ मिल गई। तब याद है मुझे, लोग यहीं कहते फिर रहे थे कि लालू जाति की राजनीति करते हैं। ऐसे में कांग्रेस लालू का सपोर्ट कर हमारे साथ धोखा कर रही है। इस मिलन से नाराज कांग्रेस वोटर देखते-देखते भाजपा-समता गठबंधन की ओर मुड़ गया। हालांकि, इसके बावजूद लालू की नींव को हिलाना काफी मुश्किल था।

कांग्रेस-राजद को जवाब देने के लिए भाजपा को एक मजबूत साथी की जरुरत थी, ऐसे में समता पार्टी के विलय से 1995 में बने जदयू ने भाजपा का बखूबी साथ दिया। यह गठबंधन धीरे-धीरे मजबूत होती चली गई। जदयू-भाजपा का गठबंधन बिहार में साथ में चुनाव लड़ा, लेकिन पहली बार सफलता नहीं मिली, वोटों का प्रतिशत जरूर बढ़ा। धीरे-धीरे वोटों का प्रतिशत सीटों को भी बढ़ाने लगा। केंद्र में भी भाजपा की सरकार आई, लेकिन बिहार में लालू ही सरताज थे। जब केंद्र में भाजपा की शासन खत्म हुई तो बिहार में ये टक्कर (लालू बनाम एनडीए) बराबरी की होने लगी। 2005 के चुनाव में राष्ट्रपति शासन लगा, उसके बाद लोगों ने एकतरफा एनडीए यानी भाजपा-जदयू को जीत दिलाई। 2010 में तो लालू और राम विलास पासवान पूरी तरह से खत्म ही हो गए। विपक्षी पार्टी के पास कुल 10 प्रतिशत सीटें भी नहीं थी।

लालू के जंगल राज से नीतीश (एनडीए) ने ही मुक्ति दिलाई और बिहार को विकास का रास्ता दिखाया। इसके पहले (लालू के शासन) बिहार में विकास की बातें बेमानी सी लगती थीं। नीतीश जब भाजपा संग मिले तो एनडीए को उस वक्त फायदा नहीं मिला। धीरे-धीरे लोगों को लगा कि नीतीश लालू से अलग हैं। लोगों का विश्वास एनडीए पर हुआ और फिर भाजपा और उसके सहयोगी जदयू को जीत दिलाई थी। ऐसे में नरेंद्र मोदी को लेकर नीतीश कुमार का भाजपा से अलग होने का फैसला लेना जद यू के लिए आत्मघाती साबित नहीं होगा?

हालांकि, नीतीश के आने से बिहार में विकास की गति बढ़ी। पहले जो अपराध कथित रूप से सीएम हाउस से संगठित किए जाते थे, नीतीश के शासन में ऐसा सुनने को नहीं मिला। लोग देर रात भी अपने घर तक सुरक्षित पहुंचने की उम्मीदें पालने लगे थे। चंहुओर एनडीए के इस शासन की तारीफें होने लगी। लेकिन, इन तमाम बातों के बावजूद क्या ये कहना सही होगा कि बिहार के लोग विकास के नाम पर नीतीश को वोट देंगे? अगर मान लिया जाए कि विकास के नाम पर नीतीश को वोट मिलते भी हैं तो भाजपा को भी विकास के वोट का कुछ हिस्सा तो जरूर मिलेगा।

सवाल ये भी है..

नीतीश जिस मोदी विरोध की वजह से अलग हुए उसी मोदी की एक दशक पूर्व यानी गुजरात दंगा के समय तारीफ में कसीदे गढ़े थे। ऐसे में नीतीश खुद को कैसे सेकुलर कह सकते हैं?

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